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Importance of Trikal Sandhya

 संध्या जीवन को यदि तेजस्वी, सफल और उन्नत बनाना हो तो मनुष्य को त्रिकाल संध्या जरूर करनी चाहिए ।

 

तेजस्वी जीवन की कुंजी : त्रिकाल संध्या

आजकल लोग संध्या करना भूल गये हैं इसलिए जीवन में तमस् बढ गया है । प्राणायाम से जीवनशक्ति, बौद्धिक शक्ति और स्मरणशक्ति का विकास होता है । संध्या के समय हमारी सब नाडियों का मूल आधार जो सुषुम्ना नाडी है, उसका द्वार खुला हुआ होता है । इससे जीवनशक्ति, कुंडलिनी शक्ति के जागरण में सहयोग मिलता है । वैसे तो ध्यान-भजन कभी भी करो, पुण्यदायी होता है किन्तु संध्या के समय उसका प्रभाव और भी बढ जाता है । त्रिकाल संध्या करने से विद्यार्थी भी बडे तेजस्वी होते हैं । अतएव जीवन के सर्वांगीण विकास के लिए मनुष्यमात्र को त्रिकाल संध्या का सहारा लेकर अपना नैतिक, सामाजिक तथा आध्यात्मिक उत्थान करना चाहिए । रात्रि में अनजाने में हुए पाप सुबह की संध्या से दूर होते हैं । सुबह से दोपहर तक के दोष दोपहर की संध्या से और दोपहर के बाद अनजाने में हुए पाप शाम की संध्या करने से नष्ट हो जाते हैं तथा अंतःकरण पवित्र होने लगता है ।


कब करें ? 
प्रातःकाल सूर्योदय से दस मिनट पहले और दस मिनट बाद में, दोपहर को बारह बजे के दस मिनट पहले और बाद में तथा सायंकाल को सूर्यास्त के दस मिनट पहले और बाद में - यह समय संधि का होता है । प्राचीन ऋषि-मुनि त्रिकाल संध्या करते थे । भगवान श्रीरामजी और उनके गुरुदेव वसिष्ठजी भी त्रिकाल संध्या करते थे । भगवान राम संध्या करने के बाद ही भोजन करते थे ।
कैसे करें ?
संध्या के समय हाथ-पैर धोकर, तीन चुल्लू पानी पीकर फिर संध्या में बैठें और प्राणायाम करें, जप करें, ध्यान करें तो बहुत अच्छा । अगर कोई ऑफिस या कहीं और जगह हो तो वहीं मानसिक रूप से कर ले तो भी ठीक है । 


त्रिकाल संध्या से लाभ : 
(१) अपमृत्यु नहीं होती ।
(२) रोजी-रोटी की चिंता सताती नहीं है ।
(३) व्यक्ति का तन तंदुरुस्त रहता है, मन प्रसन्न रहता है और निर्दोष हो जाता है । 
(४) मन पापों की ओर नहीं जाता ।
(५) दुःख, शोक, चिंताआदि कभी अधिक नहीं दबा सकती ।
(६) हृदय और फेफडे स्वच्छ और शुद्ध होने लगते हैं ।
(७) जन्म-जन्मांतर के पाप, ताप जलकर भस्म हो जाते हैं ।
(८) अंतःकरण की शुद्धि होती है । 
(९) सर्वत्र शांति, प्रसन्नता, प्रेम तथा आनंद मिलता है 
(१०) दुश्चरित्रता का नाश होता है और पुण्य-पुंज बढता है ।
 

ऋषि-मुनियों की बतायी हुई दिव्य प्रणाली 


त्रिकाल संध्या माने हृदयरूपी घर में तीन बार बुहारी । इससे बहुत फायदा होता है । जो तीनों समय की संध्या करता है, उसे रोजी-रोटी की चिन्ता नहीं करनी पडती, उसकी अकाल मृत्यु नहीं होती और उसके कुल में दुष्ट आत्माएँ, माता-पिता को सतानेवाली आत्माएँ नहीं आतीं । जबसे भारतवासी ऋषि-मुनियों की बतायी हुई दिव्य प्रणालियाँ भूल गये, त्रिकाल संध्या करना भूल गये, अध्यात्मज्ञान को भूल गये तभी से भारत का पतन प्रारम्भ हो गया । अब भी समय है । यदि भारतवासी शास्त्रों में बतायी गयी, संतों-महापुरुषों द्वारा बतायी गयी युक्तियों का अनुसरण करें तो वह दिन दूर नहीं कि भारत अपनी खोयी हुई आध्यात्मिक गरिमा को पुनः प्राप्त करके विश्वगुरु पद पर आसीन हो जाय । 
- पूज्य संत श्री आशारामजी बापू

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