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एकादशी का उपवास समस्‍त गृहस्थों के लिये बहुत ही महत्‍वपूर्ण और लाभदायक है । पूज्य बापूजी कहते है कि "उपवास" का अर्थ होता है "उप-वास" अर्थात भगवान के समीप रहना । व्रत का उद्देश्य आत्‍मशांति और आत्‍मानंद का अनुभव करना है । अल्‍प भोजन से मन और बुद्धि अधिक प्रभावी ढंग से कार्य करने में समर्थ होते है ।

Ekadashi



 

 

Ekadashi Mahatma Book

Ekadashi
सफला एकादशी

 


पुत्रदा/वैकुण्ठ एकादशी

1st Jan' 2015


षटतिला एकादशी

16-17 Jan' 2015


जया एकादशी

30 Jan' 2015


विजया एकादशी

15 Feb' 2015


आमलकी एकादशी

1st Mar' 2015


पापमोचनी एकादशी

17 Mar' 2015


कामदा एकादशी

31 Mar' 2015


वरुथिनी एकादशी

15 April' 2015


मोहिनी एकादशी

 29 Apr' 2015


अपरा एकादशी

 14 May' 2015


निर्जला एकादशी

29th May' 2015


योगिनी एकादशी

12th Jun' 2015


देवशयनी एकादशी

27th Jul' 2015


कामिका एकादशी

10 Aug' 2015


पुत्रदा एकादशी

26th Aug' 2015


अजा एकादशी

8th Sep 2015


पद्मा एकादशी

24th Sep' 2015


इन्दिरा एकादशी

8 Oct' 2015


पापांकुशा एकादशी

24th Oct' 2015


रमा एकादशी

7th Nov' 2015


प्रबोधिनी एकादशी

22th Nov' 2015


उत्पत्ति एकादशी

7th Dec' 2015


मोक्षदा एकादशी

21st Dec' 2015


पद्मिनी एकादशी

28 Jun' 2015


परमा एकादशी

12 July' 2015


Upcoming Ekadashi
अजा एकादशी

 

 

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अजा एकादशी


युधिष्ठिर ने पूछा : जनार्दन ! अब मैं यह सुनना चाहता हूँ कि भाद्रपद (गुजरात महाराष्ट्र के अनुसार श्रावण) मास के कृष्णपक्ष में कौन सी एकादशी होती है ? कृपया बताइये ।
भगवान श्रीकृष्ण बोले : राजन् ! एकचित्त होकर सुनो । भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष की एकादशी का नाम ‘अजा’ है । वह सब पापों का नाश करनेवाली बतायी गयी है । भगवान ह्रषीकेश का पूजन करके जो इसका व्रत करता है उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं ।
पूर्वकाल में हरिश्चन्द्र नामक एक विख्यात चक्रवर्ती राजा हो गये हैं, जो समस्त भूमण्डल के स्वामी और सत्यप्रतिज्ञ थे । एक समय किसी कर्म का फलभोग प्राप्त होने पर उन्हें राज्य से भ्रष्ट होना पड़ा । राजा ने अपनी पत्नी और पुत्र को बेच दिया । फिर अपने को भी बेच दिया । पुण्यात्मा होते हुए भी उन्हें चाण्डाल की दासता करनी पड़ी । वे मुर्दों का कफन लिया करते थे । इतने पर भी नृपश्रेष्ठ हरिश्चन्द्र सत्य से विचलित नहीं हुए ।
इस प्रकार चाण्डाल की दासता करते हुए उनके अनेक वर्ष व्यतीत हो गये । इससे राजा को बड़ी चिन्ता हुई । वे अत्यन्त दु:खी होकर सोचने लगे: ‘क्या करुँ ? कहाँ जाऊँ? कैसे मेरा उद्धार होगा?’ इस प्रकार चिन्ता करते-करते वे शोक के समुद्र में डूब गये ।
राजा को शोकातुर जानकर महर्षि गौतम उनके पास आये । श्रेष्ठ ब्राह्मण को अपने पास आया हुआ देखकर नृपश्रेष्ठ ने उनके चरणों में प्रणाम किया और दोनों हाथ जोड़ गौतम के सामने खड़े होकर अपना सारा दु:खमय समाचार कह सुनाया ।
राजा की बात सुनकर महर्षि गौतम ने कहा :‘राजन् ! भादों के कृष्णपक्ष में अत्यन्त कल्याणमयी ‘अजा’ नाम की एकादशी आ रही है, जो पुण्य प्रदान करनेवाली है । इसका व्रत करो । इससे पाप का अन्त होगा । तुम्हारे भाग्य से आज के सातवें दिन एकादशी है । उस दिन उपवास करके रात में जागरण करना ।’ ऐसा कहकर महर्षि गौतम अन्तर्धान हो गये ।
मुनि की बात सुनकर राजा हरिश्चन्द्र ने उस उत्तम व्रत का अनुष्ठान किया । उस व्रत के प्रभाव से राजा सारे दु:खों से पार हो गये । उन्हें पत्नी पुन: प्राप्त हुई और पुत्र का जीवन मिल गया । आकाश में दुन्दुभियाँ बज उठीं । देवलोक से फूलों की वर्षा होने लगी ।
एकादशी के प्रभाव से राजा ने निष्कण्टक राज्य प्राप्त किया और अन्त में वे पुरजन तथा परिजनों के साथ स्वर्गलोक को प्राप्त हो गये ।
राजा युधिष्ठिर ! जो मनुष्य ऐसा व्रत करते हैं, वे सब पापों से मुक्त हो स्वर्गलोक में जाते हैं । इसके पढ़ने और सुनने से अश्वमेघ यज्ञ का फल मिलता है ।
 


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