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सद्गुरु महिमा का क्या कहना |

सद्गुरु महिमा का क्या कहना |

यदि शिष्य सद्गुरू के कथनानुसार भलीभांति साधन करे तो उसके व्यावहारिक तथा पारमार्थिक सभी कार्य सिद्ध हो जायेंगे और अंत में वह अमर, अभय ब्रम्हस्वरूप को प्राप्त हो जायेगा, फिर उसके ऊपर किसी भी  प्रकार का काल का जोर नहीं चलेगा |
                                   -संत दादू दयालजी

कबीर गुरु की भक्ति करू, तजि बिषया रस चौज१  |
बार बार नहिं पाइहैं२ ,मानुष जन्म की मौज ||

वस्तु३ कहीं ढूँढै कहीं , केहि बिधि आवै हाथ |
कहै कबीर तब पाइये,जब भेदी लीजे साथ ||

भेदी लीन्हा साथ कर, दीन्ही वस्तु लखाय |
कोटि जन्म का पन्थ था, पल में पहुँचा जाय ||

जाति बरन कुल खोई के ,भक्ति करै चित लाय |
कह कबीर सतगुरु मिलैं, आवागवन नसाय   ||

                                    -संत कबीर जी

गुरु वैध के समान है |जैसे वैध अपनी अनुभूत  औषधियों से रोगी का रोग नष्ट करता हैं, वैसे ही गुरु भी अपने अनुभव, ज्ञान द॒वारा जीव के जन्म –मरणादि रोग हरते है |

                                               -संत रज्जबजी

जब जीव का भाग्योदय होता है तो शुभ फल के तौर पर उससे सद्गुरु का मिलाप होता है  |

गुरु उसके दुखो  और भ्रमो  का नाश करके उसके जीवन में सुखो का प्रकाश बिखेर देते है |

गुरु के आज्ञापालन में आत्मानंदरूपी अमृत  हैं| जो उनकी आज्ञानुसार चलते  हैं, वे सहज ही उस अमृत को पा जाते हैं |
                 - गुरु नानकदेवजी

सद्गुरु बिना ब्रम्हज्ञान नहीं होता और ब्रम्हाज्ञान हुए बिना जन्म –मरण  का दुःख नहीं मिटता | बेचारे अज्ञानी मनुष्य सद्गुरु को छोड़कर नाना प्रकार के साधन करते फिरते हैं परतु गुरुकृपा बिना वह सब परिश्रम व्यर्थ  हो जाता है | जिसे मोक्षं की चाहना हो, उसे सद्गुरु की खोज करनी चाहिए | सद्गुरु बिना जन्म निष्फल है |                                     -
समर्थ रामदासजी

 गुरु उपदेश देनेवाले शिक्षक नहीं, गुरु अपनी आत्मा है,  रमेश्वर भी वही हैं |सब मत –मतांतर को त्यागकर ईश्वरस्वरूप श्री सद्गुरु की शरण हो जाना, उनका ध्यान करना, उनके चरणों में प्रीति करना परम आत्मधर्म है | जो मनुष्य आत्मधर्म की साधना करते हुए, आत्मधर्म का पालन करते हुए देह छोड़ता है, वह  मोक्षं पाता ही   है |                     -स्वामी

मुक्तानंद जी

ईश्वर जन्म देता है जीव के रूप में, माता पिता जन्म देते हैं  देह के रूप में, लेकिन गुरु जब जन्म देते हैं, तब ब्रम्हा के रूप में  ही जन्म देते हैं | शिष्य के ह्रदय में वे परमात्मा को ही ठूँस-ठूँसकर भर देते हैं |

सद्गुरु के प्रति अनन्य भाव जाग जाय तो वे तुम्हारे जीवन की डोर सँभाल लेंगे और खेल खेल में, हास्य –विनोद में तुम्हारी परम धाम की यात्रा पूर्ण कर देंगे |        

   - पूज्य संत श्री आशारामजी बापूजी



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